औरतों की जीवन शैली में बदलाव आए ताकि वह भी आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास को महसूस कर सकें

बदलते समाज के साथ बदलती सोच- जाहिर बात है और महिलाओं की सभी क्षेत्रों में भागीदारी इसी का प्रतीक है.

ध्यान से देखा जाए तो तो हर काल में कुछ स्त्रियां उदाहरण बन के सामने आई है. चाहे वह सती से लेकर सावित्री हो या वो रानी लक्ष्मीबाई हो या प्रतिभा पाटिल.
आज पत्रकारिता की राजनीति के मेडिकल के और अर्थव्यवस्था से लेकर फाइनेंस के क्षेत्र में महिलाएं सबसे ऊपर है. उन्होंने अपने लाजवाब काम से और परिपक्वता से सबका दिल जीत लिया है
परंतु क्या महिलाओं की भागीदारी के साथ साथ उनकी स्थिति में भी सुधार आया है?


महिलाओं के बढ़ती भागीदारी को देखकर लगता है कि शायद परिवर्तन आ चुका है लेकिन वह परिवर्तन देश में आया है असली परिवर्तन आम लोगों के जीवन में आना चाहिए. जरूरत है उनकी सोच में परिवर्तन लाने की, उनकी मानसिकता को बदलने की, कुरीतियों और कुख्यालों को पीछे छोड़ कर आगे बढ़ने की, अंधविश्वासों और अंधश्रद्धा ओं को समाप्त करने की.
आज पूरे समाज में वुमन एंपावरमेंट का बोलबाला है. लोग वूमेन एंपावरमेंट के नारे लगाते फिरते हैं. क्या ऐसे नारे लगाने से औरतों को उनकी आजादी मिल सकती है अपना हक मिल सकता है? वूमेन एंपावरमेंट का सही मायनों में अर्थ यह है कि औरतों की स्थिति में सुधार हो उनकी सोच में सुधार हो.
तो क्यों महिलाओं की कुछ समस्याएं ऐसी हैं जिन्हें हम आज भी एक पर्दे के पीछे रखना चाहते हैं

महिलाओं के खिलाफ अपराध बढ़ते जा रहे हैं. शहर असुरक्षित होते जा रहे हैं. क्यों कुछ चुनिंदा लोगों की वजह से स्त्रियों के बाहर निकलने के रास्ते बंद कर दिए जाते हैं. क्यों समाज में जिन बातों और जिन चीजों की जरूरत नहीं है उनको बार-बार दोहराया जाता है.
लड़कियों को बचपन से ही खाना बनाने की कला सिखाई जाती है परंतु उन्हें आत्मनिर्भरता सिखाया जाए यह बहुत कम देखा जाता है.
महिलाएं अपनी पीरियड की समस्याओं पर चर्चा करने मे हिचकीचाती है. दरअसल हम ही ने अपने समाज को कुछ इस तरीके से ढाला हुआ है कि हम अपने परिजनों से, अपने सहपाठियों से इस विषय में चर्चा नहीं कर सकते और अगर कोई करता हो तो उसे मॉडर्न करार दिया जाता है. आज भी देश में कई इलाके ऐसे हैं जहां पीरियड के समय महिलाओं का घरों, रसोई घरों में, पूजा स्थलों में होना अशुद्ध माना जाता है.

ऐसी सोच मानसिक बीमारी का एक हिस्सा है. आज से लगभग 20 साल पहले यह सोच रखने वाले लोगों का होना साधारण था लेकिन आज विज्ञान की तरक्की के बाद मेडिकल साइंस की तरक्की के साथ जहां ज्यादा से ज्यादा लोग एजुकेटेड हैं वहां ऐसी सोच रखना पिछड़ा हुआ माना जाएगा. पीरियड्स का होना स्वभाविक है, फिर भी ऐसे समय में औरतों को पुस्तकों और धार्मिक स्थलों से दूर रखा जाता है. यह सब चीजें एक लड़की की मानसिक स्थिति, भावुकता और रहन-सहन के तरीके पर प्रभाव करता है.

लड़कियों को उनके तरीके से जीने नहीं दिया जाता. ऐसी सोच को पीछे छोड़ कर आगे बढ़ने का एक तरीका है, शिक्षा. जितनी ज्यादा शिक्षा की उतना ही कम अंधविश्वास. महिलाओं की शिक्षा से समाज में स्वास्थ्य स्तर में वृद्धि हो सकती है.
यह एक समस्या ना होते हुए भी समाज में निषेध(taboo) का कारण बनती जा रही है. जरूरत है कि सोच ओगे बड़े. औरतों की जीवन शैली में बदलाव आए ताकि वह भी आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास को महसूस कर सकें. ना उन्हें कोई दबा सके ना डरा सके. ना रुका सके ना झुका सके.

 

news by yanshi 

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