डर के आगे जीत है

अपना हक मांगने में डर किस बात का |

बहुत दिनों से सोच रहा था कुछ लिखूं लेकिन डर लगता था |
आखिरकार कितने दिनों तक डरोगे? लोग नौकरी पाने और अपना कार्य करने में इतने व्यस्त हो चुके है कि अपने जिम्मेदारी ( नागरिक, छात्र इत्यादि )को भूलते जा रहे है |एक अच्छा छात्र और नागरिक होने का हक़ खोते जा रहे है , जिसको कोई जिम्मेदारी मिली है उससे अपेछा करने की बजाय अपने भी आदमी कुछ मेहनत तथा एक छात्र या नागरिक होने का दायित्व निभाते तो शायद सिस्टम आपको इतना नहीं  मारता |
जो आदमी या छात्र अपना हक़ किसी से नहीं ले सकता वो क्या आगे करेगा आप अंदाजा लगा सकते है | अपने तो चुप रहो और दूसरो से कहो कितुम बोलते नहीं हो | क्यों बोले कोई ? और आपको अपने पैसे और जिम्मेदारी की चिंता नहीं है तो कोई और कोई क्यों उसे पूरा करें | लोग एक दुसरे से बातें करते है की यार ये व्यवस्था हो जाती तो अच्छा हो जाता क्यों नहीं वो चीज बिलकुल हो सकती है लेकिन आपमें अपना हक़ मांगने की ताकत नहीं बची है | आप क्यों नहीं सिस्टम से पूछते हो कि हमें ऐसा क्यों नहीं मिला क्योकि आप डरते हो |
कई वर्षो /महीनो से आप किसी चीज से वंचित रहते हो जिसके लिए आप आये हो और उसके लिए एक शब्द किसी से जबाब देहि नहीं पूछ सकते ? तो आप ये भी किसी से कहने का हक़ नहीं रखते की ये वस्तु या व्यवस्था क्यों नहीं मिल रही | समय ऐसा आ गया है कि जब तक आप अपना हक़ नहीं मांगोगे तब तक आपको कोई आपका हक़ नहीं देने वाला | क्योकि आज के दौर में सब कोई बैठे-बैठे अमीर बनना चाहता है बिना कुछ किये | अगर आपका कोई हक़ ले रहा है, और आप चुप है,तब कुछ दिन बाद वो दोगुना लेना चाहेगा क्योकि आप कुछ बोल नहीं रहे | और जिस दिन आप पूछना चालू कर देंगे वो आधा लेने लगेगा और कुछ दिनों में आपका हक़ लेना बंद कर  देगा |
एक बात आप गांठ बांध ले कि चाहे कोई भी सरकार या व्यवस्था आ जाये आपको अपना हक़ मांगे बिना नहीं देने वाला और आप अपनी शिकायत  दूसरो कहते-कहते चले जाओगे |
एक बात आप गांठ बांध लो कि चाहे कोई भी सरकार या व्यवस्था आ जाये , आपके मांगे बिना कोई आपका हक़ नहीं देने वाला और आप जरुरत की सिकायत दूसरो से करते करते चले जाओगे|
written by brijesh yadav 

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