पिता की कहानी

पिता की कहानी

पूरे घर के बोझा अपने कंधे में लिए चलते हैं
खून पसीने के आंचल में हमारी मुस्कान भरते हैं
चोट लगे तो गोद में और गर्व हो तो कंधे में धरा करते हैं
मुसीबतों के अंगारों में भी मुस्कुराते हुए चलते हैं
हमारे पापा कभी अपना दर्द बयां नहीं करते हैं |

 बेटी हो तो लाडली और बेटे को राजा बनाए रखते हैं
मां को रानी का दर्जा देकर घर को महल बनाया करते हैं
महंगे कपड़ों से महंगी गाड़ी को किस्तों में लिया करते हैं
पर अपने फटे कपड़ों को वह सुई से सिला करते हैं
हमारे पापा कभी अपना दर्द बयां नहीं करते हैं|

 

पाई पाई जोड़ के, सूखी रोटियां तोड़ के
एक अच्छे कॉलेज में दाखिला करवाया करते हैं
पढ़ लिखकर अच्छी नौकरी पर गर्व जताया करते हैं
खुद की जरूरतों को पूरा करते देख
पापा हम पर बहुत मुस्कुराया करते हैं|

 

फिर वह एक समय में आते हैं
अपनी बढ़ती दवाइयों को देख
बहुत ज्यादा घबराते हैं
उनकी जिंदगी की आखिरी इच्छा
वह अपने परिवार बढ़ते देखना चाहते हैं|

 

बेटी को ससुराल भेज बेटी जैसी बहू ढूंढना करते हैं
हमारे पापा अपनी पसंद छोड़
हमारी पसंद में ही खुश हुआ करते हैं
विवाह की पावन बेला को वह सर्वथा संपूर्ण करते हैं
हंसता खेलता परिवार देख वह काफी खुश हुआ करते हैं
अपने पोते पोतियो को गोद में खिलाने के वह अब सपने देखा करते हैं
बर्फी सास बहू की लड़ाई देख दिल छोटा कर लिया करते हैं|

समय के चलते देखो लड़ाइयां बढ़ती जाती है
लड़ाइयां बढ़ते चल होने की बात सामने आती है
फिर एक दिन अखबारों को पलटने पर एक चिट्ठी सामने आती है
वह चिट्ठी पापा को वृद्ध आश्रम बुलाती है|

 छुट्टियों के बहाने से पापा को आश्रम छोड़ आते हैं
1 हफ्ते बाद वापस आने का वादा करो सालों के लिए चलते जाते हैं
बच्चों के इंतजार में वह आखिरी सांसे गिना करते हैं
पर हमारे पापा कभी अपना दर्द बयां नहीं करते हैं|

written by abhisekh bhatt

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