प्रोफ़ेसर जीडी अग्रवाल जी की मृत्यु प्रकृति या फिर कुछ और??

भारत की अनेक धार्मिक अवधारणाओं में गंगा नदी को देवी के रूप में निरूपित किया गया है। गंगा का नाम सुनते ही  हृदय में आस्था कि भावना उजागर हो जाती है। परंतु आज गंगा का रूप बदल गया है, गंगा में प्रदूषण का अस्तर चरम-सीमा पर पहुंच गया है। 2014 लोक सभा चुनावों से पहले हमारे चैंपियन आफ द अर्थ ने  गंगा मां की कसम खाकर गंगा को 2019 से पहले पूर्ण रूप से साफ करने का वादा किया था। 2019 आते-आते गंगा तो साफ़ हुईं नहीं परंतु गंगा के लिए हमारे देश के दो महान व्यक्तियों ने अपनी जान अवश्य न्यौक्षावर कर दी है ‌। इसे यह साफ प्रतीत होता है कि, जहां गंगा के लिए कुछ लोग जान देने तक सीमित है,वंही कुछ लोग नारा देने तक सीमित है।

आज़ हम बात कर है, प्रोफेसर जीडी अग्रवाल जिन्होंने 17 सालो तक IIT कानपुर में सिविल एंव एनवायर्नमेंटल ईंजइंजीनिय की शिक्षा ना जाने कितने छात्रों को दी, मीडिया और राजनीति को भी गंगा के बारे में बताया। परंतु गंगा की कसमें खाकर गंगा को साफ़ करने की बात कहने वाले हमारे प्रधान सेवक माहोदय को एक 86 साल के प्रोफ़ेसर द्वारा दिए जा रहे अनशन से कोई भी फर्क नहीं पड़ा,22 जून से आमरण अनशन पर बैठे प्रो.जीडी अग्रवाल का 112 दिनों बाद निधन हो गया, उस गंगा के लिए जिसके नाम पर दो मिनट में हमारे देश के नेता हिंदू-मुसलमान कर राजनीति करने का कोई भी अवसर नहीं छोड़ते हैं, परंतु एक ईमानदार प्रयास के साथ कोई नहीं खड़ा हुआ ना गंगा बच सकी और ना ही प्रो.जीडी अग्रवाल।

सोचिए ज़रा भारत जैसे देश में जहां सरकार ने गंगा के लिए इतने मंत्रालय बना दिए,इतनी राजनीति हो गई, हमारे प्रधान सेवक माहोदये ने इतने वादें कर दीए,उस देश में एक प्रोफ़ेसर 112 दिनों के अनशन पर बैठ अपने प्राण त्याग देता है परंतु किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता है।

10 अक्टूबर की सुबह जिला प्रशासन ने जीडी अग्रवाल जी को जबरन उठाकर AIMS में भर्ती करा दिया,परंतु वंहा भी उन्होंने जल त्याग जारी रखा, डाक्टरों के मनाने पर दवा के तौर पर पोटैशियम लेने को तैयार हो गाए, गुरूवार सुबह उन्होंने एक पत्र लिखकर AIMS डाक्टरों की तारीफ की। प्रोफ़ेसर जीडी अग्रवाल की लिखावट को देखकर, यह साफ हो जाता है कि 112 दिनों के अनशन के बाद उनकी तबीयत उतनी खराब नहीं थी। सदन के लोगों और प्रोफेसर को जाने वाले लोगों का मानना है कि प्रोफ़ेसर जीडी अग्रवाल जी की मौत की जांच होनी चाहिए।

    प्रोफेसर जीडी अग्रवाल जी की क्या मांगे थी

  • गंगा में हो रहा अवैध खनन बंद कराया जाए
  • गंगा के रास्ते को अविरल किया जाए।उउसक रास्ते में बांध न बनाएं जाएं
  • गंगामें गिर रही गंदगी को रोका जाए, इसको लेकर एक कानून बनाया जाए।

गंगा और जल संसाधन मंत्री नितिन गडकरी द्वारा पत्र भेजा तो गया परंतु उसमें पूर्णतय आश्वासन न होने के कारण प्रोफ़ेसर जीडी अग्रवाल जी ने उसे खारिज कर दिया।

चालिए गंगा पर मंडरा रहे ख़तरे से आप सभी को अवगत कराते हैं 

2014 में वन पर्यावरण मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक

  • हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट ने 2013 की आपदा को बढ़ाने में आग में घी का काम किया है

इसी रिपोर्ट में गंगा नदी के बेसिन में बांधौ का निर्माण रोके जाने की बात कही है, परंतु सरकार ने इसे गंभीरता से नहीं लिया।

अगर हम आज की बात करें तो अलकनंदा, भागीरथी, मंदाकिनी के बेसिन में 70 बांध परियोजनाएं चल रही है जिसमें से 19 पूरी हो गई है,24 बड़े बांध गंगा पर प्रस्तावित है जिस पर सुप्रीम कोर्ट का स्टे लगा हुआ है।

NIDM की रिपोर्ट ने उत्तराखंड की विकास नीतियों को तबाही का सटीक नुस्खा बताया है

   2014 रवी चोपड़ा कमेटी रिपोर्ट के मुताबिक

  • बांधों ने गंगा अपूरणय क्षति पहुंचाई है।
  • इस कमेटी में जाने-माने वैज्ञानिक शामिल थे,परंतु मोदी सरकार ने इसे भी नजर अंदाज कर दिया।

    2018 नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक

हिमालय में पानी के श्रोत 60% सूखने की कगार पर है।

    2018 में NBSS  की रिपोर्ट के मुताबिक़

  • करीब आधा उत्तराखंड आती गंभीर भू कटाव जल में है

हमारी सरकार, गंगा किनारे हो रहे खनन, गंगा में डाली जा रही गंदगी को रोकने के बजाए, अनशन तुड़वाने पर जोर देती है, कुछ सालों पहले संत निगमानंद ने गंगा के लिए अपनी जान दी थी, और अब प्रोफ़ेसर जीडी अग्रवाल ने अपनी जान दी है। इसी कड़ी में हरियाणा के संत गोपालदास ने अन्न जल त्याग दिया है।

अब सवाल यह है कि गंगा बचेगी या एक और जान जाएगी

News By KSHITIZ SONKER

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